(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.299. अध्यायः 299
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिषठिरंप्रति ब्राह्मणादिवर्णधर्मादिप्रतिपादकपराशरगीतानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

पराशर उवाच। 12-299-0x(6446)(77415)
वृत्तिः सकाशाद्वर्णेभ्यस्त्रिभ्यो हीनस्य शोभना।
प्रीत्योपनीता निर्दिष्टा धर्मिष्ठान्कुरुते सदा॥ 12-299-1(77416)
वृत्तिश्चेन्नास्ति शूद्रस्य पितृपैतामही ध्रुवा।
न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रयोजयेत्॥ 12-299-2(77417)
सद्भिस्तु सह संसर्गः शोभते धर्मदर्शिभिः।
नित्यं सर्वास्ववस्थासु नासद्भिरिति मे मतिः॥ 12-299-3(77418)
यथोदयगिरौ द्रव्यं सन्निकर्षेण दीप्यते।
तथा सत्सन्निकर्षेण हीनवर्णोऽपि दीयते॥ 12-299-4(77419)
यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्बरम्।
तादृशं कुरुते रूपमेतदेवमवेहि मे॥ 12-299-5(77420)
तस्माद्गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कदाचन।
अनित्यमिह मर्त्यानां जीवितं हि चलाचलम्॥ 12-299-6(77421)
सुखे वा यदि वा दुःखे वर्तमानो विचक्षणः।
यश्चिनोति शुभान्येव स भद्राणीह पश्यति॥ 12-299-7(77422)
धर्मादपेतं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम्।
न तत्सेवेत मेधावी न तद्धितमिहोच्यते॥ 12-299-8(77423)
`धर्मेण सहितं यत्तु भवेदल्पफलोदयम्।
तत्कार्यमविशङ्केन कर्मात्यन्तं सुखावहम्॥' 12-299-9(77424)
यो हृत्वा गोसहस्राणि नृपो दद्यादरक्षिता।
स शब्दमात्रफलभाग्राजा भवति तस्करः॥ 12-299-10(77425)
स्वयंभूरसृजच्चाग्रे धातारं लोकसत्कृतम्।
धाताऽसृजत्पुत्रमेकं लोकानां धारणे रतम्॥ 12-299-11(77426)
तमर्चयित्वा वैश्यस्तु कुर्यादत्यर्थमृद्धिमत्।
रक्षितव्यं तु राजन्यैरुपयोज्यं द्विजातिभिः॥ 12-299-12(77427)
अजिह्नैरशठक्रोधैर्हव्यकव्यप्रयोक्तृभिः।
शूर्दैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति॥ 12-299-13(77428)
अप्रनष्टे ततो धर्मे भवन्ति सुखिताः प्रजाः।
सुखेन तासां राजेन्द्र मोदन्ते दिवि देवताः॥ 12-299-14(77429)
तस्माद्यो रक्षति नृपः स धर्मेणेति पूज्यते।
अधीते चापि यो विप्रो वैश्यो यश्चार्जने रतः॥ 12-299-15(77430)
यश्च शुश्रूषते शूद्रः सततं नियतेन्द्रियः।
अतोऽन्यथा मनुष्येन्द्र स्वधर्मात्परिहीयते॥ 12-299-16(77431)
प्राणसंतापनिर्दिष्टाः काकिण्योऽपि महाफलाः।
न्यायेनोपार्जिता दत्ताः किमुतान्याः सहस्रशः॥ 12-299-17(77432)
सत्कृत्य हि द्विजातिभ्यो यो ददाति नराधिपः।
यादृशं तादृशं नित्यमश्नाति फलमूर्जितम्॥ 12-299-18(77433)
अभिगम्य तु यद्दत्तं धर्म्यमाहुरभिष्टुतम्।
याचितेन तु यद्दत्तं तदाहुर्मध्यमं फलम्॥ 12-299-19(77434)
अवज्ञया दीयते यत्तथैवाश्रद्धयाऽपि वा।
तदाहुरधमं दानं मुनयः सत्यवादिनः॥ 12-299-20(77435)
अतिक्रामेन्मज्जमानो विविधेन नरः सदा।
तथा प्रयत्नं कुर्वीत यथा मुच्येत संशयात्॥ 12-299-21(77436)
दमेन शोभते विप्रः क्षत्रियो विजयेन तु।
धनेन वैश्यः शृद्रस्तु नित्यं दाक्ष्येण शोभते॥ ॥ 12-299-22(77437)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि एकोनत्रिशततमोऽध्यायः॥ 299॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-299-1 नित्यं हीनस्य शोभनेति ध. पाठः॥ 12-299-6 तस्माद्गुणेषु रमतामिति थ. पाठः॥ 12-299-7 स तन्त्राणीहेति झ. पाठः॥ 12-299-10 यो धृत्वा गोसहस्राणीति झ. पाठः॥ 12-299-12 कुर्यादर्थं समृद्धिष्विति ध. पाठः॥ 12-299-17 काकिण्यो विंशतिवराटिकाः॥ 12-299-21 तथा मुच्येत किल्विषादिति थ. पाठः॥ 12-299-22 दाक्ष्येण सेवार्थोत्साहेन॥


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